Friday, January 22, 2010

मुरली तेरा मुरलीधर - 42


वह इच्छुक है सुनने को तेरे गीतों का स्वर मधुकर
आ आ मुख निहार जाता है नीर नयन में भर निर्झर
सरस तरंगित उर कर अपना बाँट रहा आनन्द विभव
टेर रहा सुख गीत गुंजिता मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२६॥

सुन वह कैसे गाता तूँ विस्मय विमुग्ध सुन-सुन मधुकर
इस नभ से उस नभ तक करता आलोकित वह स्वर निर्झर
उसके स्वर में स्वर संयुत कर विह्वल गायन हेतु मचल
टेर रहा रस भाव विमुग्धा मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२७॥

धूल बीच निज अन्तर के सारे दुर्भाव मिला मधुकर
निज उर में प्राणेश प्रीति का विमल प्रसून खिला निर्झर
क्या न पता तेरे अंगों पर प्रियतम का जीवित स्पंदन
टेर रहा है प्राणस्पर्शिनी  मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२८॥

निज चिन्तन से सब असत्य का कर दे उन्मूलन मधुकर
वह तो सत्य वही है जिससे ज्योतित उर चिन्तन निर्झर
पाणि अपावन कर सकते कैसे पावन पद प्रच्छालन
टेर रहा नख-शिखा पावनी मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२९॥

क्या अछोर कर्म सागर में श्रम कर कर हारा मधुकर
स्वेदसिक्त श्लथ सुखी हो सका नहीं बिचारा मन निर्झर
हो समीप स्थित शांति सदन प्रिय निर्निमेष मुख-चन्द्र निरख
टेर रहा दर्शनानुरक्ता मुरली तेरा मुरलीधर ॥२३०॥

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# आया है प्रिय ऋतुराज ...  (सच्चा शरणम )

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