Saturday, November 14, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 31

 बार बार पथ घेर घेर वह टेर टेर तुमको मधुकर
तेरे रंग महल का कोना कोना कर रसमय निर्झर
सारा संयम शील हटाकर सटा वक्ष से वक्षस्थल
टेर रहा है हृदयवल्लभा मुरली  तेरा  मुरलीधर।।166।।

हृदय सिंधु के द्युतिमय मोती पलकों में भर भर मधुकर
सच्चा सरसिज मृदुल चरण पर अर्घ्य चढ़ाता चल निर्झर
वह पूर्णेन्दु प्राण वारिधि में स्नेहिल लहरें उठा उठा
टेर रहा है प्रीतिकातरा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।167।।

प्रेम बावरे पर यह जग कीचड़ उछालता है मधुकर
प्रेम पथिक को स्वयं बनाना पड़ता अपना पथ निर्झर
पथ इंगित करती दुलराती प्रियतम की प्रेरणा कला
टेर रहा है  प्रीतिप्रगल्भा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।168।।

अद्भुत उसका खेल बिन्दु में सिन्धु उतर आता मधुकर
लहर लहर में उठ सागर ही बिखर बिखर जाता निर्झर
नभ पट पर उडुगण लिपि में लिख नित नित नूतन संदेशा
टेर रहा है प्रीतिपत्रिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।169।।

जाने तुममें क्या पाता नित बन ठन कर आता मधुकर
तृप्त न होता पुनः पुनः वह चूम चूम जाता निर्झर
मिलन प्रतीक्षा की वेला बन करता लीला रस वर्षण
टेर रहा है मिलनमंदिरा मुरली  तेरा   मुरलीधर।।170।।

--------------------------------------------------------------

आपकी टिप्पणी से प्रमुदित रहूँगा । कृपया टिप्पणी करने के लिये प्रविष्टि के शीर्षक पर क्लिक करें । साभार ।

-------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# मुक्तिबोध की हर कविता एक आईना है ...   (सच्चा शरणम )

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails