Tuesday, February 9, 2010

मुरली तेरा मुरलीधर - 43

भू लुण्ठित हो धूलिस्नात हो जाय न जब तक तन मधुकर।
वह निज कर में ले दुलराये तेरा लघुप्रसून निर्झर
विलख भले सुरभित न किन्तु वह पदसेवा से करे न च्युत
टेर रहा सेवासुखोदग्मा मुरली तेरा मुरलीधर।२३१।

आभूषण क्या प्रिय संगम रोधक प्राचीर नहीं मधुकर
हो सकती है एकमेव फिर युगल शरीर नहीं निर्झर
सहज सरल अनलकृंत जीवनगीत बाँसुरी मे भर भर
टेर रहा है सहजस्पन्दिनी मुरली तेरा मुरलीधर।२३२।

निज को निज कन्धे बैठाये अज्ञ दुखारी तू मधुकर
उसे क्यो न सौंपता विहँस जो अखिल भारहारी निर्झर
तेरी इच्छा का श्वाँसानिल देता दीपक ज्योति बुझा
टेर रहा अस्तित्वअर्पिता मुरली तेरा मुरलीधर ।२३३।

वहीं प्राणधन का सिंहासन वहीं चरण संस्थित मधुकर
जहाँ पतिततम महादीनतम अविदित जन संस्थित निर्झर
ओझल किये उसे गहरे मे दंभगर्भिणी मोह निशा
टेर रहा है दंभतमघ्नी मुरली तेरा मुरलीधर ।२३४।

तब तक भटकेंगे दृग तेरे बहिर्जगतगति में मधुकर
जब तक बोधा नहीं अतन्द्रित बन्द किये लोचन निर्झर
आंसू जल मे बह जायेगा पंथ बहिर्गामी पंकिल
टेर रहा अस्मिताविलीना मुरली तेरा मुरलीधर ।२३५। -------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# फागुन मतवारो यह ऐसो परपंच रच्यौ..  (सच्चा शरणम)

प्रविष्टि पसंद आयी हो तो प्रविष्टि को लिंक-बैक करें...



Friday, January 22, 2010

मुरली तेरा मुरलीधर - 42


वह इच्छुक है सुनने को तेरे गीतों का स्वर मधुकर
आ आ मुख निहार जाता है नीर नयन में भर निर्झर
सरस तरंगित उर कर अपना बाँट रहा आनन्द विभव
टेर रहा सुख गीत गुंजिता मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२६॥

सुन वह कैसे गाता तूँ विस्मय विमुग्ध सुन-सुन मधुकर
इस नभ से उस नभ तक करता आलोकित वह स्वर निर्झर
उसके स्वर में स्वर संयुत कर विह्वल गायन हेतु मचल
टेर रहा रस भाव विमुग्धा मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२७॥

धूल बीच निज अन्तर के सारे दुर्भाव मिला मधुकर
निज उर में प्राणेश प्रीति का विमल प्रसून खिला निर्झर
क्या न पता तेरे अंगों पर प्रियतम का जीवित स्पंदन
टेर रहा है प्राणस्पर्शिनी  मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२८॥

निज चिन्तन से सब असत्य का कर दे उन्मूलन मधुकर
वह तो सत्य वही है जिससे ज्योतित उर चिन्तन निर्झर
पाणि अपावन कर सकते कैसे पावन पद प्रच्छालन
टेर रहा नख-शिखा पावनी मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२९॥

क्या अछोर कर्म सागर में श्रम कर कर हारा मधुकर
स्वेदसिक्त श्लथ सुखी हो सका नहीं बिचारा मन निर्झर
हो समीप स्थित शांति सदन प्रिय निर्निमेष मुख-चन्द्र निरख
टेर रहा दर्शनानुरक्ता मुरली तेरा मुरलीधर ॥२३०॥

--------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# आया है प्रिय ऋतुराज ...  (सच्चा शरणम )

प्रविष्टि पसंद आयी हो तो प्रविष्टि को लिंक-बैक करें...



Tuesday, January 5, 2010

मुरली तेरा मुरलीधर 41


तुम गुरु स्वयं शिष्य मन तेरा प्रथम सुधारो मन मधुकर
जग सुधार कामना मत्त मत जग में करो गमन निर्झर ।
करता विरत कृष्ण-चिन्तन से जगत राग द्वेषादि ग्रसित
टेर रहा है मनसंयमिनी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२१॥

स्वयं कृपालु बनो मन पर दो उसे प्रबोधन स्वर मधुकर
प्यारे अब बनना न किसी का प्रियतम प्रिया तनय निर्झर।
अपनी पूरी शक्ति लगा दो बना उसे हरि चरण भ्रमर
टेर रहा है मनस्तोषिणी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२२॥

समय न गंवा व्यर्थ  चिन्तन में अन्तस्तल में जग मधुकर
मुट्ठी में बाँधता लहर की झाग अज्ञ फेनिल निर्झर ।
सागर की गहराई में हीरे हैं रहा टटोल कहाँ
टेर रहा अस्तित्वबोधिनी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२३॥

तुम्हें अनंत कर दिया उसने ऐसा सुखदाता मधुकर
पुनः पुनः कर रिक्त पुनः नव जीवन भर जाता निर्झर ।
तेरी लघु वंशी से घाटी-घाटी गाता गीत नवल
टेर रहा अनवरत सहचरी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२४॥

आती भेंट उतर अनंत की तेरे लघुकर में मधुकर
अमृत स्पर्श उसके हाथों का रचता हर्श सिन्धु निर्झर ।
युग बीतते उड़ेल रहा भरने को फिर भी शेष सदन
टेर रहा अक्षयसुखकोषा मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२५॥


चित्र साभार : http://radhemohan.blogspot.com
--------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ-
# करुणावतार बुद्ध-9 ....(सच्चा शरणम)

प्रविष्टि पसंद आयी हो तो प्रविष्टि को लिंक-बैक करें...



Wednesday, December 30, 2009

सुधि उमड़ती रहे बदलियों की तरह ...

सुधि उमड़ती रहे बदलियों की तरह    ।
तुम झलकते रहो बिजलियों की तरह ॥

प्रभु हृदय में मेरे तुमको होगी घुटन
मैने गंदा किया सारा वातावरण 
ऐसे हिय में बिरह की सलाई लगा
प्राण सुलगें अगरबत्तियों की तरह     ||1||

दृष्टि बस फेर दो कष्ट कट जायेगा
कुछ तेरा सच्चे बाबा न घट जायेगा
उर की क्यारी में भगवन खिलो बन सुमन
मन मचलने लगे तितलियों की तरह ||2||

मैं हूँ दुनिया का सबसे बुरा आदमी
बोझ ढ़ोने में यदि चाहते हो कमी
मेरा अपराध-तरु झोर दो झर पड़ें
पाप सूखी हुई पत्तियों की तरह        ||3||

तेरी सुधि से बिलग मत रहे एक क्षण
मेरी हर श्वांस, हर रोम, हर रक्त-कण
अपनी चुटकी का बल आप देते रहें
मै थिरकता रहूँ तकलियों की तरह  ||4||

सोचते कौन तुम मेरी नेकी - बदी
ताल ‘पंकिल’ हूँ मैं तुम हो गंगा नदी
प्रेम चारा चुँगाते चलो चाव से
मैं निगलता चलूँ मछलियों की तरह  ||5||

 photo source : wikimedia
------------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ - 
# शायद आज मैं मिलूँगा तुमसे ...  (सच्चा शरणम )

प्रविष्टि पसंद आयी हो तो प्रविष्टि को लिंक-बैक करें...



Tuesday, December 22, 2009

मुझे पाती लिखना सिखला दो...

मुझे पाती लिखना सिखला दो हे प्रभु नयनों के पानी से ।
बतला दो कैसे शुरू करुंगा किसकी राम कहानी से ।।

घोलूँगा कौन रंग की स्याही, किस टहनी की बने कलम
है कौन कला जिससे पिघला, करते हो लीलामय प्रियतम,
हे प्रभु तुम प्रकट हुआ करते हो, किस मनभावनि वाणी से-
मुझे पाती लिखना ...........................................।।1।।

कैसा होगा पावन पन्ना, कैसे होंगे अनुपम अक्षर
कोमल अंगुलि में थाम जिसे, तुम पढ़ा करोगे पहर-पहर,
कैसे खुश होंगे रूठ गये, क्या प्रभु मेरी नादानी से -
मुझे पाती लिखना ............................................।।2।।

अपनी प्रिय विषयवस्तु बतला दो, सच्चे प्रभु त्रिभुवन-साँईं
क्या कहाँ रखूँगा, कितनी होगी  प्रेम-पत्र की लम्बाई,
कब प्रभु अंतरतम जुड़ जायेगा सच्चे अवढर दानी से -
मुझे पाती लिखना ...........................................।।3।।

दृग-गोचर होंगे क्या न देव, कब तक लुक-छिप कर खेलोगे
इस मंद भाग्य को क्या न कभीं करूणेश ! गोद में ले लोगे
‘पंकिल’ मानस को मथा करोगे, अपनी प्रेम-मथानी से -
मुझे पाती लिखना ...........................................।।4।।

------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ --
# करुणावतार बुद्ध - 7.....  (सच्चा शरणम)

प्रविष्टि पसंद आयी हो तो प्रविष्टि को लिंक-बैक करें...



Wednesday, December 16, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 40



तिल तिल तरणी गली नहीं दिन केवट के बहुरे मधुकर
वरदानों के भ्रम में ढोया शापों का पाहन निर्झर
सेमर सुमन बीच अटके शुक ने खोयी ऋतु वासंती
टेर रहा मानसप्रबोधिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।216।।

देह गेह कोई न तुम्हारा नश्वर संयोगी मधुकर
तुम तो प्रिय की गलियों में फिरने वाले योगी निर्झर
बहने दे उसके प्रवाह में सत्ता संज्ञाहीन परम
टेर रहा है आशुतोषिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।217।।

बिना अश्रु सच्चे प्रियतम तक पहुँचा ही है क्या मधुकर
सच्चा रस से पावन भावन और न कोई रस निर्झर
ठिठक न तू तो गोपीवल्लभ की गोपिका विकल बौरी
टेर रहा है अमर्यादिता  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।218।।

उसे याद आयेगी तेरी हल्की भी हिचकी मधुकर
व्यथा कथा अनकही तुम्हारी भी सब उसे ज्ञात निर्झर
मत घबरा वह माँ है लेगी करुण गोद में बिठा तुम्हें
टेर रहा है अन्तरंगिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।219।।

साधन साध्य नहीं वह सच्चा कृपा साध्य ही है मधुकर
देख तुम्हारी दीन दशा विह्वल हो उठता है निर्झर
वह मायास्वामी तू माया दास बॅंधा छटपटा रहा
टेर रहा है मायामुक्ता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।220।।

प्रविष्टि पसंद आयी हो तो प्रविष्टि को लिंक-बैक करें...



Saturday, December 12, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 39

तरुण तिमिर देहाभिमान का तुमने रचा घना मधुकर
सुख दुख की छीना झपटी में चैन हुआ सपना निर्झर
धूल जमी युग से मन दर्पण पर हतभागी जाग मलिन
टेर रहा तनतुष्टिनिरस्ता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।211।।

पलकें खुलीं रहीं दिन दिन भर पर तू जगा कहाँ मधुकर
दिवास्वप्न ताने बाने बुनने में व्यस्त रहा निर्झर
किया याचना मंदिर मंदिर बना भिखारी का जीवन
टेर रहा है मोहमर्दिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।212।।

चैत्र बौर बैशाख भोर सी जेठ छाँह जैसी मधुकर
घटा अषाढ़ी श्रावण रिमझिम भाद्र दामिनी सी निर्झर
आश्विन की चन्द्रिका कार्तिकी पवन अगहनी सरिता सी
टेर रहा रोमांचकारिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।213।।

पूष दुपहरी माघ अनल फाल्गुनी फाग जैसी मधुकर
उसकी सेज स्पर्श आकृति स्मिति करुणामयी दृष्टि निर्झर
निज खोना ही उसको पाना श्वाँस श्वाँस में रचा बसा
टेर रहा आनन्दनिर्झरी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।214।।

दो अतियों के बीच झूल तू सुखी न रह सकता मधुकर
बहुत कसी अति श्लथ वीणा से राग न बह सकता निर्झर
चलनी में जल भर भर अपना गला सींच पायेगा क्या
टेर रहा है दृगोन्मीलनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।215।।
---------------------------------------------------------------
अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# स्वर अपरिचित....  (सच्चा शरणम )

प्रविष्टि पसंद आयी हो तो प्रविष्टि को लिंक-बैक करें...



Related Posts with Thumbnails

Apture