Friday, December 11, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 38

वह विराम जानता न क्षण क्षण झाँक झाँक जाता मधुकर
दुग्ध धवल फूटती अधर से मधुर हास्य राका निर्झर
प्रीति हंसिनी उसकी तेरे मानस से चुगती मोती
टेर रहा है अविरामछंदिनी  मुरली  तेरा  मुरलीधर।।206।।

अंगारों पर भी प्रिय से अभिसार रचाता चल मधुकर
अज अनवद्य अकामी को लेना बाँहों में भर निर्झर
जन्म जन्म के घाव भरेंगे फूल बनेंगे अंगारे
टेर रहा है जयजयवंती मुरली   तेरा    मुरलीधर।।207।।

वह अद्भुत रस की हिलोरमय सिंधु कुलानन्दी मधुकर
शिशु अबोध मुकुलित किशोर वह युवा जरठ काया निर्झर
मुक्ता मण्डित निलय वही वह तृण कुटीर पल्लव पंकिल
टेर रहा है स्वबसचारिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।208।।

प्रिय चिंतन प्रिय रस मज्जन ही रुचिर सुरंग सरस मधुकर
उससे होकर अपर जगत में कर सकता प्रयाण निर्झर
एक अनिर्वच दिव्य ज्योति में तुमको नख शिख नहला कर
टेर रहा है आलोकपंखिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।209।।

मन चाहा अंचल कब किसको जग में मिल पाता मधुकर
बुझती तृषा न अधर आस में सूखा रह जाता निर्झर
लेता कूल छीन लहरों की सब उर्मिल अभिलाषायें
टेर रहा है तृप्तिपयोदा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।210।।
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# करुणावतार बुद्ध-५   (सच्चा शरणम )

Saturday, December 5, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 37

उसके संग संग मिट जाते सभी उदासी स्वर मधुकर
फूल हॅंसी के नभ से भू पर झरते हैं झर झर निर्झर
उसके नयन जलद कर देते प्राण दुपहरी को पावस
टेर रहा है हृदयाह्लादिनि मुरली   तेरा    मुरलीधर।।201।।

कौन तुला जिस पर तौलेगा उसका अपनापन मधुकर
जैसा वह गा रहा कौन वैसा गाने वाला निर्झर
हर स्वर उसकी ही पद पैजनि हर द्युति उसकी ही चपला
टेर रहा है सर्वास्वादा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।202।।

पग पग पर चल रहा संग तेरी अंगुली थामे मधुकर
क्षण क्षण पूछ रहा मुस्काता तेरा क्षेम कुशल निर्झर
स्वयं भॅंवर में कूद खे रहा तेरी जीवन जीर्ण तरी
टेर रहा है सदासंगदा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।203।।

रे बौरे वासना वाटिका में न ठिठक जाना मधुकर
रीझ किसी छलना छाया पर मन मत ललचाना निर्झर
बुला रही है प्राणेश्वर की शीतल सुखद अंक छाया
टेर रहा है प्राणशरण्या मुरली   तेरा    मुरलीधर।।204।।

उसकी पीर न सोने देगी उमड़ेंगे लोचन मधुकर
अकुलायेंगे प्राण अकेले में बेसुध हो हो निर्झर
अरुण उषा की प्रथम पुलक सी अंग अंग कर रोमांचित
टेर रहा उच्छ्वसितअंतरा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।205।।
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# प्राणों के रस से सींचा पात्र : बाउ (गिरिजेश भईया की लंठ-महाचर्चा)

Thursday, November 26, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 36

कोना कोना प्रियतम का जाना पहचाना है मधुकर
इठलाता अटपटा विविध विधि आ दुलरा जाता निर्झर
शब्द रूप रस स्पर्श गन्ध की मृदुला बाँहों में कस कस
टेर रहा है अनन्तआस्वादा मुरली तेरा मुरलीधर।।196।।

हिला हिला दूर्वादल अंगुलि बुला रहा तुमको मधुकर
पर्वत पर्वत शिखर शिखर पर टेर रहा सस्वर निर्झर
चपल जलद पाणि से भेंज भेंज कर संदेशा
टेर रहा है आनन्दपर्विणी मुरली  तेरा मुरलीधर।।197।।

विरही तेरे श्याम न आये कैसे जीवित है मधुकर
तन में ग्रीष्म नयन में पावस भर उर में बसन्त निर्झर
मुख हेमन्त शरद गण्डस्थल चल रोमावलि शिशिर बना
टेर रहा है ऋतुरसस्विनी मुरली तेरा  मुरलीधर।।198।।

उसके अधरों से सीखा सुमनों ने मुस्काना मधुकर
उसके अधरों से ही सीखा कोकिल ने गाना निर्झर
छलकाता रहता मयंक उसके अधरों का अमृत
टेर रहा अधरामृतवर्षिणी मुरली  तेरा  मुरलीधर।।199।।

बॅंध बॅध कर रुक रुक जाता वह लघु में भी विराट मधुकर
थकते कभीं न उसके गाते अधर मिलन के स्वर निर्झर
मुँदी पलक में भी  वह नटखट आ रच लेता है शय्या
टेर रहा है स्वजनकंचुकी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।200।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ - ३ (सच्चा शरणम)

Tuesday, November 24, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 35

चिर विछोह की अंतहीन तिमिरावृत रजनी में मधुकर,
फिरा बहुत बावरे अभीं भी अंतर्मंथन कर निर्झर
सुन रुनझुन जागृति का नूपुर खनकाता वह महापुरुष
टेर रहा है अनहदनादा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।191।।

पी उसकी स्मिति सुधा प्रफुल्लित दिगदिगन्त अम्बर मधुकर
विहॅंसित वन तृण पर्ण धवलतम तुहिन हिमानी कण निर्झर
मधुर मदिर प्राणेश हॅंसी में डूब डूब उतराता चल
टेर रहा है प्रीतिपंखिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।192।।

उमड़ घुमड़ घन मोहन का संदेशा ले आये मधुकर
इधर तुम्हें रोमांच उधर वे भी पुलके होंगे निर्झर
वे भींगे होंगे आये हैं तुम्हें भींगाने को बादल
टेर रहा है मेघरागिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।193।।

तेरा जीवन गेंद गोद ले रखे गिरा दे या मधुकर
मृदु कर से सहलाये अथवा चरण ताड़ना दे निर्झर
तू उसका है जैसे चाहे तुमसे खेले खिलवाड़ी
टेर रहा है मुक्तमानसा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।194।।

कितनी करुणा है उसकी कल्पना न कर सकता मधुकर
जितना डूबेगा उतना ही आनन्दित होगा निर्झर
उसका दण्ड विधान कोप भी सदा अनुग्रह मय सुखमय
टेर रहा है त्रिवर्गफलदात्री मुरली   तेरा    मुरलीधर।।195।।


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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# पराजितों का उत्सव : एक आदिम संदर्भ-२ (सच्चा शरणम )

Friday, November 20, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 34

सुन अनजान प्राणतट का मोहाकुल आवाहन मधुकर
रस सागर की तड़प भरी सब चाहें ममतायें निर्झर
स्मरण कराता जन्म जन्म के लिये दिये अनगिन चुम्बन
टेर रहा है प्रीतिमादिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।186।।

मृदु गलबहियाँ दे बन जाता हार तुम्हारा वह मधुकर
सब अनखिला खिला देता है उसका मधु दुलार निर्झर
उसकी बाँहों की डाली में रसमय झूला झूल नवल
टेर रहा ऋतुराजनियोगा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।187।।

उसका ही विहार वृन्दावन कर अपना अंतर मधुकर
नयनों में प्राणेश मिलन का भर ले सजल सरस निर्झर
तू क्या जाने निपट अनाड़ी कब रच दे कैसी लीला
टेर रहा है चित्तचोरिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।188।।

रख स्मृति वही प्राणवल्लभ सिन्दूर रेख तेरी मधुकर
वह भावना चित्रलेखा वह कुंकुम भाल तिलक निर्झर
दूर नहीं प्रति श्वांस श्वांस में वह मंगलमय मनमोहन
टेर रहा जीवनश्रृंगारा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।189।।

भग्न पाल अनभिज्ञ खेवैया जीवन जीर्ण तरी मधुकर
क्षुभित जलधि प्रतिकूल प्रभंजन फिर भी चलता चल निर्झर
उसका है तो फिर क्या चिन्ता आयेगा खेनेवाला
टेर रहा है संकटहरणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।190।।
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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# करुणावतार बुद्ध - 3 (सच्चा शरणम )

Wednesday, November 18, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 33

बिक जा बिन माँगे मन चाहा मोल चुका देता मधुकर
जगत छोड़ देता वह आ जीवन नैया खेता निर्झर
कठिन कुसमय शमित कर तेरा आ खटकाता दरवाजा
टेर रहा है प्रीतिपीठिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।176।।

रहे न तुम वह था न रहोगे तब भी वह होगा मधुकर
टेर रहा तेरे अंचल की छाया में लुक छिप निर्झर
भींगी पलकें पोंछ तुम्हें ले अंक भाल सहला सहला
टेर रहा है प्रीतिमेदिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।177।।

क्या होती है थकित चकोरी पी पी चन्द्र किरण मधुकर
कहाँ पी कहाँ रटते थकते चातक के न अधर निर्झर
रहो पंथ में आँख बिछाये प्रिया गमन के दिन गिनते
टेर रहा है प्रीतिचातकी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।178।।

पश्चातापी नयन सलिल दिन रात बहाता रह मधुकर
बिलख हाय मिल सका न प्रिय का मिलन महोत्सव रस निर्झर
अनायास ही अनुकंपा से आ जायेगा वह नटवर
टेर रहा है प्रीतिभामिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।179।।

जब प्रयाणरत प्राणों की होगी कम्पित बाती मधुकर
शोकाकुल आँगन बिरवा की सूखेगी छाती निर्झर
तुम्हें अंक में ले रच देगा माथे पर सौभाग्य तिलक
टेर रहा है प्रीतिमंजरी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।180।।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -
# करुणावतार बुद्ध  (सच्चा शरणम )

Monday, November 16, 2009

मुरली तेरा मुरलीधर 32

अपने ही लय में तेरा लय मिला मिला गाता मधुकर
अक्षत जागृति कवच पिन्हा कर गुरु अभियान चयन निर्झर
तुमको निज अनन्त वैभव की सर्वस्वामिनी बना बना
टेर रहा है भूतिभूषणा मुरली  तेरा   मुरलीधर।।171।।

दृग खुलते झलकता पलक झंपते ही आ जाता मधुकर
बुला लिया है तो न लौटकर फिर जाने देता निर्झर
कभीं न कुम्हिलाने वाली अपनी वरमाला पहनाकर
टेर रहा है रहसरंगिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।172।।

सुख दुख पाप पुण्य दिन रजनी मरण अमरता में मधुकर
ऊर्ध्व अधः सुर असुर जीव जगदीश्वर में न बॅंधा निर्झर
निगम ‘‘रसोवैसः आनन्दोवैसः’’ कह करते गायन
टेर रहा है श्रुत्यर्थमण्डिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।173।।

श्वेत केश मुख दशन रहित कटि झुकी जरा जरजर मधुकर
रस विरहित शोणित वाहिनियाँ झूली श्लथ काया निर्झर
देखो जीवन छाया पट पर उसका यह भी चित्रांकन
टेर रहा है रचनाविशारदा मुरली   तेरा    मुरलीधर।।174।।

अश्रु मुखी अनमनी म्लान रहने न तुम्हें देगा मधुकर
अपने दिनमणि पर भरोस रख तू सरसिज कलिका निर्झर
तेरी पीड़ा का निदान है प्रियतम की अम्लान हॅंसी
टेर रहा है लोमहर्षिणी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।175।।
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